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जब हम भजन करेगें तो भगवान हमें अवश्य ही मुक्ति देगें:आचार्य तरुण डोगरा 

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ऊना की ग्राम पंचायत झंबर में श्रीराम कथा महापुराण का विधिवत रूप हुआ समापन

ऊना/सुशील पंडित: जिला उपमंडल ऊना की ग्राम पंचायत झंबर में चल रही श्रीराम महापुराण कथा का वीरवार को विधिवत रूप से समापन हो गया। आचार्य तरुण डोगरा ने अपने मुखारविंद से कथा के समापन अवसर पर अमृत बर्षा करते हुए कहा कि साधु संत ही हमें सच्चा मार्ग दिखाते हैं और संतो का सानिध्य सहज नहीं मिलता। उन्होने कहा कि हमें प्रभु भजन करने के लिए ही भगवान ने इस धरती पर जन्म देकर भेजा है। जब हम भजन करेगें तो भगवान हमें अवश्य ही मुक्ति देगें। उन्होने बताया कि रामायण से हमें जीने की सीख मिलती है और श्रीमदभागवत कथा हमें मरना सीखाती है। क्योंकि यह मानव जीवन एक हवा का झोंका है जो आता है और चला जाता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा भगवान से मिलन से हो तो, हमें अपनी मृत्यु से डरना नहीं चाहिए। यदि हम कहीं भी रामकथा या भागवत कथा सुनने आते हैं तो हमें वहां से परम सौभाग्य लेकर जाना चाहिए। 
आचार्य तरुण डोगरा जी ने कहा कि श्रीमदभागवत कथा में बताया गया है कि जो प्राणी कलयुग में भगवान का भजन करेंगे, उन्हें कोई  कष्ट-कलेश नहीं होगा। उन्होने बताया कि इस धरती पर जीव अकेला पैदा हुआ था और अकेला ही इस संसार को छोड़कर जाएगा। उन्होने बताया कि किस प्रकार भगवान ने अनेक अवतारों में जन्म लेकर इस धरती को अधर्म से धर्म के मार्ग पर चलाया है और आज उस प्रभु के द्वारा ये सारी सृष्टि रचित है जिसे इस धरती का एक-एक जीव जानता है लेकिन आज के इस युग में लोग भगवान को न मानकर अपने आपको स्वंय भगवान का स्थान देने लगे हैं। उन्होने श्रीराम कथा में उपस्थित असंख्या में उमड़े श्रद्धालुओं को भक्ति रस में रंग दिया।
उन्होने बताया कि भगवान की प्रथा और संतो के मिलने से ही प्रभु भक्ति की धारा उत्पन्न होती है और वह समय इतना अनमोल होता है कि भगवान भी इसकी कीमत नहीं चुका सकते। भगवान की भक्ति करने का एकमात्र यही रास्ता है कि हम कथा सुनने के माध्यम से ही भगवान के साक्षात दर्शन कर सकते हैं। उन्होने बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने अपनी माया से किस प्रकार कामदेव को भी परास्त कर दिया था क्योंकि कामदेव गोपियों को पाना चाहते थे लेकिन श्री कृष्ण ने कामदेव को भी युद्ध करने तक चुनौती दे दी थी। क्योंकि गोपियां भी श्री कृष्ण का रसपान करती थी। और ठीक इसी प्रकार भगवान श्रीराम ने अपनी माया शक्ति से इस धरती पर मानव रूप धारण कर श्री रामायण की कथा अवतरित कर हमें जीने की सीख दी है। उन्होने कहा कि हम कथा सुनते हैं और चले जाते हैं लेकिन भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण ही एकमात्र हमारा सहारा है जो हमारी नैया पार कर सकते हैं।
उन्होने बताया कि इस संसार पर हम स्वंय ही हावी हो चुके हैं और भगवान का नाम लेने से संकोच करते हैं। इसका कारण हम स्वंय नहीं ये कलयुग का प्रकोप है। क्योंकि ब्रह्मा द्वारा वेदों में ये लिखा भी गया है कि कलयुग में लोग पुण्य कम और पाप ज्यादा करेगें। उसी का परिणाम आज हम देख और सुन भी रहे हैं। उन्होने आज की युवा पीढ़ी को कथा के माध्यम से अच्छे कर्म करने का आग्रह करते हुए कहा कि आज का युवा वर्ग पुरानी संस्कृति, धर्म और हिंदुत्व समाज को भूलता जा रहा है। इसमें युवा पीढ़ी के साथ साथ उनके माता पिता का भी हाथ है क्योंकि अगर माता पिता द्वारा बच्चों को अच्छी शिक्षा और भारतीय संस्कृति के बारे में ज्ञान दिया जाता है तो काफी हद तक बच्चे और आज की युवा पीढ़ी इस देश का भविष्य बनकर उभर सकते हैं। उन्होने कहा कि सुख बाहर की नहीं, बल्कि भीतर की संपदा है। यह संपदा धन से नहीं, धैर्य से प्राप्त होती है। हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान है अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने धैर्यवान हैं। सुख और प्रसन्नता आपकी सोच पर निर्भर करती है। इस दौरान उन्होंने परमपिता परमात्मा से उपस्थित श्रोताओं के भविष्य के लिए सुख, समृद्धि, शांति की कामना भी की।

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