बोले, कथा सुनने के बाद व्यक्ति को हमेशा अपनाना चाहिए सत्य मार्ग
ऊना/सुशील पंडित: देवभूमि हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना उपमंडल की ग्राम पंचायत झंंबर में 1 अप्रैल से 7 अप्रैल तक चल रही श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन आचार्य श्री तरुण डोगरा ने अपने मुखारविंद से अमृत वर्षा करते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत कथा श्रवण करने मात्र से ही व्यक्ति की भगवान में तन्मयता समायोजित हो जाती है। उन्होंने बताया कि धर्म जगत में जितने भी योग, यज्ञ, अनुष्ठान आदि किए जाते हैं, उन सब का एक ही लक्ष्य होता है कि हमारी भक्ति भगवान में लगी रहे और हम प्रतिक्षण प्रभु प्रेम में समायोजित रहें। वहीं संसार के प्रत्येक कण में हमें मात्र अपने प्रभु के ही दर्शन हों। आचार्य तरुण डोगरा ने सैंकड़ो की तादात में उपस्थित भक्तजनों को बताया कि श्रीमद् भागवत कथा श्रवण मात्र से ही भक्तों के हृदय में ऐसी भावनाएं समाहित हो जाती हैं कि वह मन, वाणी व कर्म से प्रभु में लीन हो जाता है।
उन्होंने बताया कि श्रीमद् भागवत कथा के प्रारंभ में सत्य की वंदना की गई है, क्योंकि सत्य व्यापक होता है, सत्य सर्वत्र होता है और सत्य की चाह सबको होती है। हालांकि पिता अपने पुत्र से सत्य बोलने की अपेक्षा रखता है। भाई, भाई से सत्य पर चलने की चेष्ठा करता है। मित्र, मित्र से सत्यता निभाने की कामना रखता है, यहां तक कि चोरी करने वाले चोर भी आपस में सत्यता बरतने की अपेक्षा रखते हैं, इसलिए प्रारंभ में महर्षि श्री वेदव्यास ने सत्य की वंदना के द्वारा ही श्रीमद् भागवत ग्रंथ का मंगलाचरण किया है और भागवत कथा का विश्राम भी सत्य की वंदना के द्वारा किया गया है। उन्होंने कहा कि इन सभी बातों का यही तात्पर्य है कि सत्य ही कृष्ण है, सत्य ही प्रभु श्रीराम और सत्य ही शिव एवं सत्य ही मां दुर्गा है। उन्होंने कहा कि हम इस मानव रूपी जीवन में जितनी भी श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करेंगे, हमारे इस नश्वर शरीर के पाप उतने ही कम होंगे। इसलिए हमें मन, चित और एकाग्रता से अंतरात्मा को प्रभु के चरणों में रखकर श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए, क्योंकि प्रभु श्री कृष्ण भागवत गीता में कहते हैं कि इस पृथ्वी का जो जीव मेरी ओर एक कदम बढ़ाएगा मैं उसकी और दस कदम बढूंगा। कथा के दौरान उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं और उनकी माया के भजन गाकर पंडाल में बैठी सैंकड़ों की तादाद में संगत को नाचने पर मजबूर कर दिया।
उन्होंने श्रद्धालुओं को उपदेश देते हुए कहा कि कथा श्रवण करने वाला जीव सत्य को अपनाता है और सत्य में ही रम जाता है। यानी सत्य रूप परमात्मा में विशेष तन्मयता आ जाती है। आचार्य तरुण डोगरा ने कहा कि मानव जीवन का सर्वश्रेष्ठ परम धर्म यही है कि उसको जीवन में अपने इष्ट के प्रति प्रगाढ़ भक्ति होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि श्रीमद् भागवत कथा में निष्कपट धर्म का वर्णन किया गया है। जो व्यक्ति निष्कपट हो, उसी व्यक्ति की कथा कहने एवं श्रवण करने का अधिकार है। उन्होंने बताया कि श्रीमद् भागवत कथा श्रवण करने का संकल्प लेने मात्र से ही पितामह श्री कृष्ण भक्त के हृदय में आकर अवश्रद्ध हो जाते हैं। उन्होंने श्रीमद् भागवत कथा को एक पका हुआ फल बताया, क्योंकि अन्य फलों की अपेक्षा इस भागवत रूपी फल में गुठली एवं छिलके का ना होकर केवल रस ही भरा होना है, इसलिए भागवत कथा को जीवन पर्यन्त व्यक्ति को पान करना चाहिए।