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स्वयं की आवाज सुनने वाला मनुष्य कभी उग्र नहीं हो सकता: तरुण डोगरा

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ऊना/सुशील पंडित : देव भूमि हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना स्थित ग्राम पंचायत झंबर में चल रहे 9 दिवसीय श्री रामकथा महायज्ञ में क्षेत्र के सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य तरुण डोगरा ने अपने मुखविंद से प्रवचनों की अमृत बर्षा करते हुए कहा कि विनम्रता का अर्थ सबकी सुन लेना नहीं, परंतु स्वयं की सुन लेना है। विनम्र मनुष्य का अर्थ ही वह मनुष्य है, जो दूसरों की कम और स्वयं की आत्मा की आवाज को ज्यादा सुनता हो। स्वयं की आवाज सुनने वाला मनुष्य कभी भी उग्र नहीं हो सकता, क्योंकि उग्रता का कारण ही केवल इतना सा है, कि स्वयं की आवाज को अनसुना कर देना।

उन्होने कहा कि कई बार हम कठिन दौर से गुजरते हैं यही जीवन है। जो हुआ है अच्छे के लिए हुआ है, हमें नकारात्मक में भी सकारात्मकता ढूंढनी चाहिए। हमें जीवन को भरपूर जीना है और सकारात्मकता पर ध्यान देना है। उन्होने कहा कि हमारा अत्याधिक लगाव समस्याएं पैदा करता है। वह जो अपने प्रियजनों से अत्यधिक जुड़ा हुआ है। उसे चिंता और भय का सामना करना पड़ता है। क्योंकि सभी दुखों की जड़ लगाव है। इसलिए खुश रहने के लिए हमें लगाव छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि गीता सार में स्पष्ट कहा गया है कि जो पुत्र पैदा ही न हुआ हो अथवा पैदा होकर मृत हो या फिर मूर्ख हो। इन तीनों में से पहले दो ही बेहतर हैं न कि तीसरा, कारण यह है कि प्रथम दोनों तो एक बार ही दु:ख देते हैं। जबकि तीसरा हर-पल दुखदायी होता है।

आचार्य तरुण डोगरा ने कहा कि भगवान ने अनेक अवतारों में जन्म लेकर इस धरती को अधर्म से धर्म के मार्ग पर चलाया है और आज उस प्रभु के द्वारा ये सारी सृष्टि रचित है जिसे इस धरती का एक-एक जीव जानता है लेकिन आज के इस युग में लोग भगवान को न मानकर अपने आपको स्वंय भगवान का स्थान देने लगे हैं। जिससे इस धरती पर प्रलय आने का भी योग बन सकता है, क्योंकि अगर ये मानव रूपी जीवन स्वंय ही भगवान बन जाए तो इस सारी सृष्टि का संचार कौन करेगा? उन्होने सैकड़ों की तादात में बैठे भक्तों को बताया कि बर्ष में एक बार इस मानव रूपी जीवन को सुप्रसिद्ध स्थान *गया जी* में जाकर अपने पूर्वजों का भगवान को साक्षी मानकर पिंडदान जरूर करना  चाहिए, ताकि हमारे इस नश्वर जीवन का उद्धार हो सके। वहीं, कथा के दौरान श्रोताओं से खचाखच भरे हुए पंडाल में ऐसे लग रहा था मानो कि भगवान श्री राम स्वंय धरती पर अवतरित होकर विराजमान हो गए है। वहीं चौथे दिन अंतिम पंक्तियों की ज्ञान गंगा बहाते हुए उन्होने कहा कि अगर दिल में भगवान को पाना है तो प्रभु सिमरन मात्र से ही हमारे पास पंहुच जाते हैं, क्योंकि ऐसा सत्य एवं ग्रंथों में वर्णित है।

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