सरकार में नियुक्तियों में आर.एस.एस और गैर आर.एस.एस का भेद करेगा चुनावों को कुप्रभावित..

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बिलासपुर(रामसिंह):-यद्यपि मंडी संसदीय सीट पर कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं और स्वयं पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री तथा हाल ही में कांग्रेस पार्टी में लौटे पंडित सुखराम को यह आशंका सता रही है कि क्या अपने प्रभाव वाले उस संसदीय क्षेत्र जिससे 6 बार सांसद और मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह उन इलाकों में पूरे मन से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार आश्रय शर्मा का सहयोग व समर्थन कर पायेंगे अथवा नहीं, वहीं दूसरी ओर भाजपा के बड़े बड़े नेता भी मुख्यमंत्री सहित इस आशंका से ग्रसित हैं, कि इस समय अंदर ही अंदर भाजपा में आर एस एस और गैर आर.एस.एस के बीच चल रहे आपसी मन मुटाव ,आर एस एस से ही ऊपर उठे भाजपा के उम्मीदवार राम स्वरूप शर्मा के चुनाव को कूप्रभावित तो नहीं करने जा रहा है।
राजनैतिक पर्यवेक्षक कहते हैं कि जहां पूर्व काल में सुखराम और वीरभद्र सिंह का आपसी राजनैतिक विरोध बहुत पहले से ही जगजाहिर है और सुखराम के एकाएक अपने पौत्र आश्रय शर्मा सहित हाईकमान की सहमति से कांग्रेस में लौट आने की एक मात्र राजनैतिक घटना ही उनके बीच में वर्षों से चले आ रहे मनमुटाव को समाप्त करने में काफी नहीं मानी जा रही, वहीं भाजपा में विशेष रूप से मंडी संसदीय क्षेत्र में आर एस एस और गैर आर एस एस के बीच में आंतरिक लड़ाई को हवा देने में स्वयं मंडी जिले से संबन्धित मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर न ही अपने कार्यकलापों से महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है और अपने सवा वर्ष के शासनकाल के उनके सदैव आर एस एस पक्षीय लिए गए निर्णय व नियुक्तियाँ ही अब इस विषय पर उनकी रातों की नींद हराम किए हुए है।
उनका मानना है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर द्वारा एक के बाद एक अपने सचिवालय में और बोर्डों तथा निगमों में अध्यक्षों और उपाध्यक्षों के पदों पर नियुक्तियों में जिस प्रकार आर एस एस के कार्यकर्ताओं को अधिमान देते हुए, उन पदों के पात्र होने के बावजूद भी, ऊंचे-ऊंचे पदों पर विराजमान किया गया है, इस कारण से भी गैर आर.एस.एस वाले भाजपाइयों को भारी निराशा व जलन अथवा डाह होने स्वाभाविक ही था, क्यूँ कि शायद ही कोई गैर आर एस एस भाजपाई जयराम ठाकुर की कृपा का पात्र बन कर कोई पद प्राप्त करने में सफल हुआ हो। उनका यह भी मानना है कि ऐसे गैर आर एस एस भाजपाइयों की भी कमी नहीं है जो छिपे रूप से मुख्यमंत्री की इन आर एस एस वालों से पटी पड़ी नियुक्तियों पर उंगली उठाते हुए यह न कहते हों कि यह लोग तो सदैव से ही अपनी संस्था आर एस एस को एक गैर राजनैतिक और स्वयं सेवी तथा सांस्कृतिक संस्था बताते व प्रचारित करते रहे हैं और उन्होने कभी भी विरोध पक्ष में रहते हुए भाजपाइयों के प्रति कांग्रेस पार्टी की दमनकारी नीतियों का विरोध या को सामना ही किया हो। किन्तु अब जब जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री है तो सता की हर कुर्सी पर आर एस एस से संबन्धित लोग ही आसीन दिखते हैं जबकि गैर आर एस एस वाले धकियाए जा रहे हैं। पर्यवेक्षक कहते हैं कि इससे पूर्व भी प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार भाजपा के मुख्यमंत्री रहे हैं किन्तु उन्होंने कभी भी भाजपाइयों के मन में इस प्रकार का पार्टी के भीतर भेद लाने का कोई काम नहीं किया और न ही भाजपा के इन दो वर्गों में यह भावना ही विकसित होने दी।

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